एक हारा हुआ आदमी

एक हारा हुआ आदमी
सिर्फ एक हारा हुआ आदमी होता है
उससे ये पूछना
कि वो किसी को
प्यार करता है या नहीं
बिना किसी गलती के उसे
एक ज़ोरदार थप्पड़ मारने जैसा है

एक हारा हुआ आदमी
हमेशा इस डर में जीता है
कि जीते हुए लोगों से भरी ये दुनिया
उसे बिना प्यार
मरने को विवश न कर दे

एक हारा हुआ आदमी
दुनिया की हर चीज़ को
बहुत...
बहुत प्यार करता है।

-मनीष
13/03/2015

परित्यक्त

1)
आज की शाम, बरबस ही मन हो रहा है
ज़िंदगी की शाम की कल्पना करूँ

सूखते पीपल की डाल पर
उस पत्ते को एक-टक निहार रहा हूँ
जो इस तेज़ आंधी में
पेड़ से जुड़े रहने की अपनी कोशिशों में
कोई कसर नहीं छोड़ रहा

वो भी शायद इसी खौफ़ में है
कि जिसके साथ वो हमेशा रहा है
या रहना चाहा है
वो इस शाम के बाद
फिर मिले न मिले
दिन का अंधकार
ज़िंदगी के अंधकार में न बदल जाए...

2)
ज़हन में बस एक ही ख़याल
याद आ रही हो तुम

जिंदगी कि किसी शाम
तुम जब भी कभी मिलोगी
मेरी आखिरी सांस से ठीक पहले तक
मेरी ख़्वाहिश होगी
तुम एक बार खुलकर मुस्कराओ
एक बार, मैं चूम लूँ तुम्हारे होंठ
और पूरी जिंदगी पर हमेशा के लिए
अंकित हो जाए मेरे प्रेम का भाव

जि़ंदगी के अंधकार में विलीन हो जाने से ठीक पहले
हमारे मिलने की संतुष्टि
शून्यमान कर दे हमारी
एक दूसरे से सारी शिकायतें
तुम्हारा खिलखिला कर हंसना
पूरे ब्रह्मांड में गूंजायमान हो

कहीं भी, किसी भी कोने में
कोई भी, मेरी तरह परित्यक्त न रह जाए...


मनीष कु. यादव
01/02/2015

ज़िंदगी के बहुत सारे मायने...

चारों तरफ वीरान है
ज़िंदगी हैरान है
तुम, मैं, और हम सब कमोबेश परेशान हैं।
सब परेशान हैं
हवाएं, साँसें, रूहें
नज़ारे, नज़रें, आँखें
सूरज, चाँद, तारे... सब
तंगहाली, बदहवासी, बेहोशी
पसरे हैं चारों ओर
और आलम-ए-मातम
मौत से भी बदतर है
ज़िंदगी को खुद के लिए इतना छटपटाते
पहले कभी नहीं देखा
मौत को खुद से इतना दूर भागते
पहले कभी नहीं देखा
ज़िदगी और मौत की इस जद्दोजहद में
मैं, आप, हम सब
बहुत बुरी तरह पिस रहे हैं
तुम्हारे इश्वर ने पकड़ा था उस दिन मुझे
जब मैं अकेला घूमने निकला था
कहाँ, पता नहीं
पूछने लगा तुम यहाँ अकेले ???
मैंने कहा - तुम साथ तो हो फिर मैं अकेला कहाँ ? तुम्हारा ईश्वर लजा गया
अपने ही सवाल से
और मुझे उसकी हैसियत समझ में आ गयी
तब से मैं नास्तिक हूँ
वो बाद में फिर मुझे मिला एक दिन
फिर वही सवाल
फिर वही जवाब
और इस बार तुम्हारा इश्वर भड़क गया
अब पता नहीं कब मिलेगा
कमबख्त बात करने वाला भी कोई नहीं बचा !!!
बहुत सारे मायनों के बीच
बहुत सारे संबंधों के बीच
बहुत सारे सपनों, अंधेरों, उजालों के बीच
फंस गया हूँ मैं
न कोई रास्ता दिखता है
न कोई राहगीर
न ज़िन्दगी पास आती है, न मौत...
सारी वीरानियाँ समेट कर
दफ़्न हो जाना चाहता हूँ कहीं
ताकि पूरी कायनात में
कही कोई खामोशी न बचे
और उस जिंदादिली में
तुम्हारा इश्वर
मेरी तन्हाई
सारी उम्मीदें
सारे सपने
अँधेरे, उजाले
हवाएं, साँसें, रूहें
नज़ारे, नज़रें, आँखें
सूरज, चाँद, सितारे
सब विलीन हो जाएँ...
मनीष
14/11/2013

किसी को क्या फर्क पड़ता है?

भरी सड़क पर खड़ा वो मदारी वाला
और उसके हाथों में
साथ चल रहे बन्दर के फंदे की डोर।

अपना सा लग रहा है मंज़र
मैं बेचैन हूँ
उस बन्दर की तरह
ईधर उधर खोज रहा हूँ
आज़ाद हो पाने की
उम्मीद की एक किरण भर।

मेरी मोहब्बत, वो फंदा है
जिससे लगी डोर
तुम्हारी यादों के कब्ज़े में है
जब जिधर चाहती हैं, नचाती हैं।

सिगरेट के धुंए से निकलता ज़हर
धडकनों में घोल रहा है ज़िन्दगी
और मैं जीने की कोशिश करता हुआ
मौत के इंतज़ार में हूँ ।

मदारी का खेल जारी है
गाड़ियां चली जा रही हैं
लोग पल दो पल रुक कर
फिर बढ़ जाते हैं आगे।

तुम खुद भी तो उसी भीड़ का हिस्सा हो...

किसी को क्या फर्क पड़ता है?


- मनीष कुमार यादव