किसी को दे दो दिल

किसी को दे दो दिल, किसी पे जां निसार करो
तुम्हारे बस में ही कहां है किसी को प्यार करो 

मुकम्मल हो तो जाएं, यूं सोहबत में तुम्हारी
तुम्हें गंवारा ही कहां कि ये इंतज़ार करो 

 महकमों में बिक गई है सियासत वतन की
अपने ही लोगों पे भी ज़रा कम एतबार करो

है सबकी नज़र पर नज़र, और ज़ुबां पर ज़ुबां
यहां संभलकर चलो, ज्यों निगाह-ए-यार करो

किसी को दे दो दिल, किसी पे जां निसार करो
तुम्हारे बस में ही कहां है किसी को प्यार करो

03.07.2017

ए बाबू...

क्या मेरा यही कर्तव्य है
कि चुपचाप बैठा रहूँ अपनी झोपड़ी में
इंतज़ार करूँ, कि फ़ौजें आ धमके मेरे घर में
इंतजार करुँ, कि वो आएं, और
मेरे छत की पुआल बने
चुल्हा बनाई गई मेरी मड़ई का इंधन
उनकी मीट-भात-दारू की पार्टी को दान कर दूँ
मेरे बच्चों के लिए दूध देने वाली
उन दो बकरियों को, जिनके एवज में
गिरवी गए थे, मेरी पत्नी के सारे गहने
इंतजार करूँ, कि वो आएं
और मैं उनके सुपुर्द कर दूँ
अपनी माओं-बहनों-बेटियों की आबरु
इंतजार करूँ, कि वो आएं
और मैं अपनी जमीन, अपना जंगल
उस सरकार को दान दे दूँ , जिसका
यथार्थ से कोई, सरोकार नहीं
लोगों का, लोगों के लिए, लोगों के द्वारा
बसाया गया श्मसान
जहाँ अब लोगों का ही कुछ नहीं रहा
ए बाबू...
एक बात जान लो
मेरा घर, मेरे बच्चे, मेरी माएँ-बहनें-बेटियाँ
मेरा जंगल, मेरी जमीन
किसी के बाप की जागीर नहीं हैं
तुम्हारे बंदूकों की गोलियाँ अगर भेद करना नहीं जानतीं
तो उन्हें भी दो ट्रेनिंग
देशवासी और दशद्रोही में फ़र्क करने का
वरना मेरी बंदूक, और उसकी गोलियाँ...
तुम्हें हर संभव जवाब देने में
सक्षम हैं।

05.05.2015

मैं सपने में हत्याएँ करता हूँ

मैं सपने में हत्याएँ करता हूँ
मैं जानता हूँ
हत्याएं करना अच्छी बात नहीं है
शायद इसलिए मैं देख नहीं पाता
कि मेरी हत्याओं का भुक्तभोगी कोन है
ठीक-ठीक कुछ भी, चिन्हित नहीं होता
मगर साथ ही
मैं यह भी जानता हूँ
कि मैं किसी व्यक्ति विशेष की
हत्या की नीयत नहीं रखता
मैं चाहता हूँ करना विद्रोह
और ख़त्म कर देना चाहता हूँ
दुनिया भर की
सारी विसंगतियां, सारी कुंठाएं
सारा लोभ, सारी नफ़रत
और वो सबकुछ, जो हमें
एक अदद इंसान बनने से

दूर रखती है।

05.05.2015

मैं सोचता हूँ

मैंने देखा है तुम्हें
निहत्थों पर गोलियां बरसाते हुए
पूरी निर्ममता, बर्बरता और
कथित ईमानदारी के साथ

मगर एक दिक्कत है
गोलियां बरसाते हुए तुम
शायद ही कुछ सोचते हो
क्योंकि तुम्हारी गोलियों के चलने से
साबित तो  बस यही होता है
तुम तो यह भी नहीं सोचते
कि तुम्हारी सोच
कुछ ऐसों के कब्ज़े में है
जो शायद ही कभी कुछ सोचते हैं

तुम चाहो तो इसे ईमानदारी न कहो
मगर मेरा न्याय और मेरी इच्छा
दोनों ही इसकी पूरी गवाही देते हैं

मैं चाहूँ तो कर सकता हूँ
एक वार के बदले कई वार
छलनी कर सकता हूँ तुम सबका सीना
एक गोली के जवाब में कई गोलियों से

मगर फिर एक दिक्कत है
वो ये, कि मैं सोचता हूँ
हाँ, मैं सोचता हूँ
तुम्हारे आगे-पीछे के लोगों के बारे में
तुम्हारे भूत-वर्तमान-भविष्य के बारे में
और फिर रुक जाता हूँ
गोली चलाने से ठीक पहले
इसलिए नहीं, कि मुझमें
ताकत या हिम्मत नहीं है
बल्कि सिर्फ इसलिए
कि मेरी सोच
किसी के कब्ज़े में नहीं है।

05.05.2015