कहाँ है वतन, कहाँ राह-ए-अमन है

कैसे कहें किसकी नीयत में क्या दफ़न है
किसी के सर पे सेहरा, किसी के सर कफ़न है
हमारी रोटियां लूटने वालों के महल देखिये
इसी शहर कहीं मातम, कहीं जशन है
दूर तड़ीपार हुआ इंकलाबी कहता है
यहां ज़िन्दगी ज़िन्दगी की दुश्मन है
पूछता रहा हर मिलने वाले शख्स से मनीष
कहाँ है वतन, कहाँ राह-ए-अमन है


31/08/2015

ज़िन्दगी में ज़िंदगी से महरूम जी रहे हैं

उनकी इनायत है जो यूं बे-सुकून जी रहे हैं
ज़िन्दगी में ज़िंदगी से महरूम जी रहे हैं
एक दिन की दिल्लगी रखने वाले ज़रा देख
तुम बिन भी हम यहाँ, बा-जुनून जी रहे हैं

24.10.2015

... सो गयी है क्रांति

समंदर की गहराई
और काली रात के घुप्प अँधेरे में
मौत से भी बदतर
अटूट नींद में
सो गयी है क्रांति।


तुम्हारा देश
तुम्हारी दुनिया
तुम्हारी ज़िन्दगी
तुम्हारी मौत
तुम्हें मुबारक हों।

मैं लिंकन के भूत से लेकर
लूथर किंग, और मार्क्स के साथ
एक सम्मलेन पर निकल रहा हूँ।

जब तक क्रांति को जगाने का
मसौदा तैयार होगा
सब कुछ ख़त्म हो चुका होगा..

29.11.2013

याद आना क्या होता है

मसरूफियत में भी याद रखते हैं याद करना
वो खूब जानते हैं आज़माना क्या होता है
जानना हो तो कोई हमसे ये पूछे
मुद्दतों बाद किसी का साथ आना क्या होता है
ख़ौफ़ज़दा भी रहते हैं और परवाह भी नहीं करते
जाने कमबख्त ये ज़माना क्या होता है
तमाम ग़मों के बाद भी मुस्कराना क्या होता है
उन्हें क्या पता याद आना क्या होता है

-मनीष
06/05/2015