य़ाद आ रहा है...


अपने कमरे में बैठा हूं, और
मेरी तन्हाई का साथ दे रहा है
सुलगती सिगरेट से निकलता धुंआ...

ज़िंदगी भी कहां-कहां से अर्थ ढूंढ लाती है
एक कश लगाने के बाद मैं
सिगरेट की दूसरे सिरे की राख देखता हूँ

आग, जिसे तपा नहीं पाती,
उसे राख कर देती है...

दूसरे कश के बाद
फिर नज़र जाती है
सिगरेट के राख वाले सिरे पर
थोड़े से पानी से भरे ऐश-ट्रे में
उसे झटका देकर गिरा देता हूँ...

छस्स्स.... सी आवाज़, इस बात का एहसास कराती है,
कि उस राख में आग, अब भी बाक़ी थी
मर जाने से, ऐन पहले तक...

राख तो मैं पहले हो चुका हूँ.

याद आ रहा है, तेरा प्यार...

           - मनीष कुमार यादव 

गलत कहते हैं...

गलत कहते हैं जो ये कहते हैं वफ़ा रंग लाती है
देखो की वजह-ए-वफ़ा मैं बेरंग फिरता हूँ...
                                            
                                         - मनीष कुमार यादव

अब वो दिन तलाश...

ये न सोच किसी रोज़ तुझे भूल जाउंगा
अब वो दिन तलाश जिस दिन तुझे मैं याद न आऊं...
     - मनीष कुमार यादव

सज़ायाफ्ता...

कभी पास होने की खुशी
कभी दूर होने का ग़म
कुछ ख़्वाहिशों से भी ज़्यादा
कुछ ज़रूरत से भी कम

ममता भरी कुर्बानियों में लालच सी भूख
सद्भावना के कर्तव्य में दुर्भावना की बू
सेवा के धर्म में शोषण का पाप
जलता हुआ मन, ज़िंदगी राख़...

सारे रास्ते खुले हैं
कहीं सुकून-ओ-पनाह नहीं है
अकेला ही बढ़ चला हूं अब
कोई हमराह नहीं है

बेनाम-बदनाम हूं
बद-चलन, बे-रास्ता हूं
तुम समझते हो ज़िंदा हूं?
कैद-ए-बा-मशक्कत, सज़ायाफ्ता हूं...