बातें नहीं थमतीं...


बढ़ती ही चली जाती हैं ये सांसें नहीं थमतीं,
तुम्हारी याद जब आती है फिर आंखें नहीं थमतीं
यूं तो हर कोई सिमट जाता है चंद किस्सों के बाद,
तुम्हारी बात जब खुलती है फिर बातें नहीं थमतीं

हम भी हुए बावले बड़े, सौगात-ए-इश्क पर,
ये भूलकर कि आजकल, सौगातें नहीं थमतीं...

उनका क्या .............?

ज़िन्दगी होले होले से अपनी मौत की ओर बढ़ रही है,
मैं इस गलतफहमी में हूँ की मैं अभी और जियूँगा
तुमको मेरा ये कहना हो सकता है रास न आये
पर जो आमादा हैं मुझे देखने को
तड़पता, सिसकता, अपने आप से जूझता,
उनका क्या .............?

हां, मैं देशद्रोही हूं...

तुम तब देशद्रोह नहीं करते
जब मेरे देशवासियों की कमाई लूटते हो
तुम तब देशद्रोह नहीं करते
जब दूजों के हक पर टूटते हो

तुम तब देशद्रोह नहीं करते
जब किसी आंगनबाड़ी में
नौकरी दिलाने की खातिर
उस गरीब महिला का चीर-हरण करते हो

देशद्रोह तो तब भी नहीं होता
जब तुम किसी की जान-माल का
सौदा कर डालते हो, निरा-बेफिक्र...
महज़ इसलिए कि सामने वाला
अमूक धर्म-जाति-सम्प्रदाय का है

मगर मैं बताऊं
तुम्हारे राज मे मैं
बा-फक्र कहता हुं
मैं देशद्रोही हूं

हां, मैं देशद्रोही हूं

क्यूंकि तुम्हारे राज में
हर वो इंसान देशद्रोही है
जो तुम्हें तुम्हारी औकात दिखाने का
माद्दा रखता हो.
 
*कार्टूनिस्ट असीम को समर्पित।

- मनीष कुमार यादव

रक़ीब की कश्ती...

रक़ीब की कश्ती संवरती तो हमें भी ऐतराज़ नहीं था, मगर,
आलम-ए-ग़म यूँ है कि जिधर वो बढ़ रहे हैं,
उधर ठोकरें बहुत हैं,
और इनसान... बहुत कम !
             
                - मनीष कुमार यादव